कैप्टन अमरिंदर सिंह

कैप्टन अमरिंदर सिंह इस्तीफे के बाद गवर्नर हाउस से बाहर आए। “मैंने सुबह कांग्रेस से बात करने के बाद फैसला लिया था, अगर आप कैप्टन अमरिंदर सिंह होते तो सत्ता की स्थिति में क्या कहते? आप अपनी पार्टी के संकट से कैसे निपटेंगे ?

पंजाब में चल रहे नेतृत्व संकट के चलते वही सवाल राज्य के कांग्रेस कैडर और पार्टी के वरिष्ठ नेता पूछ रहे हैं. एक बार फिर कैप्टन अमरिंदर सिंह ने कांग्रेस नेता पद से इस्तीफा दे दिया है। पूर्व मुख्यमंत्री के साथ पार्टी के कुछ नेताओं ने स्थिति को सुलझाने के लिए शुक्रवार को सीएम सुखबीर सिंह बादल से मुलाकात की। यह घटनाक्रम पंजाब कांग्रेस अध्यक्ष सुनील जाखड़ द्वारा राष्ट्र के सामने घोषणा करने के एक दिन बाद आया है कि सत्तारूढ़ शिरोमणि अकाली दल-भाजपा गठबंधन राज्य से कांग्रेस को छीनने के लिए एक “विश्वासघाती साजिश” कर रहा है।

अभी कांग्रेस डैमेज कंट्रोल मोड में है। सत्तारूढ़ शिरोमणि अकाली दल-भाजपा गठबंधन की कार्रवाई फिलहाल चिंता का विषय है। लेकिन इससे भी बड़ी चिंता यह है कि कांग्रेस नेतृत्व इस स्थिति में क्या कर रहा है ?

पार्टी नेतृत्व जो कर रहा है वह लगातार रहा है: वह सत्ता बनाए रखने और उसे वापस जीतने पर ध्यान केंद्रित कर रहा है। वोटों की गिनती के माध्यम से भारी बहुमत ने कांग्रेस को सत्ता से सत्ता से बेदखल करने की जिम्मेदारी सौंपी है। इसे पूरा करने का यह जनादेश है। “निर्णायक गुजरात परिणाम”, जिसे भाजपा ने कांग्रेस को गिराने के साधन के रूप में इस्तेमाल करने के लिए चुना, पंजाब में उसकी जीत के लिए कोई बाधा नहीं साबित होगा।

और फिर भी, पार्टी को जीत की ओर ले जाने में कांग्रेस नेतृत्व की कथित अक्षमता ने राज्य को संकट में डाल दिया है। राजनीतिक शासन की कुछ झलक मिली है, और COVID-19 महामारी के चल रहे प्रकोप के लिए कुछ प्रगति हुई है। लेकिन पिछले एक साल में राज्य को और किन समस्याओं का सामना करना पड़ा है ?

SAD-BJP सरकार में कोयला ब्लॉकों के आवंटन में कथित अनियमितताओं की जांच करने वाले न्यायमूर्ति (सेवानिवृत्त) जय नारायण पांडेय आयोग ने अपना काम पूरा नहीं किया है. परवाणू हत्याकांड की जांच थम नहीं रही है।

SAD-BJP गठबंधन के तहत स्वास्थ्य विभाग का पंजाब के स्वास्थ्य क्षेत्र पर कुछ हद तक नियंत्रण है। यह हमें चिंतित करता है।

भाजपा का एक मजबूत समुदाय या भाषाई आधार है। यह वंचित तबके और निचली जाति के भारतीय नागरिकों के हितों का प्रतिनिधित्व करने वाली पार्टी के रूप में उभरा था। सिख बहुल पंजाब में निचली जाति के भारतीय नागरिकों और दलितों के अधिकारों का क्या होगा? क्या शिअद-भाजपा गठबंधन इन अल्पसंख्यक समुदायों में भारतीयों के हितों को गुदगुदाने में कामयाब होगा, जिनकी आबादी लगभग 30% है? या क्या सत्तारूढ़ गठबंधन के COVID-19 के प्रभाव को कम करने के प्रयास एक वास्तविक सिख-बहुल राज्य बनाने में तब्दील हो जाएंगे, जहां विभिन्न धर्म धाराओं वाले बाहरी लोगों को वरीयता मिलेगी? इस समय ये मुद्दे कांग्रेस नेतृत्व के लिए सर्वोपरि होने चाहिए।

कांग्रेस में लंबे समय से खींचतान चल रही है। लेकिन नेतृत्व उन पराजयों के साथ कैसे तालमेल बिठाता है? क्या कैप्टन अमरिंदर सिंह आंसू बहाएंगे और नेतृत्व से परे देखेंगे?

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